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सियासत में कुछ परमानेंट नहीं: जो कभी कैप्टन को करते थे सलाम, आज सिद्धू के साथ 'ठोक रहे ताली'

सियासत में कुछ भी परमानेंट नहीं होता। कब किसका पलड़ा भारी हो जाए और कौन कब सत्ता का सिरमौर बन जाए, ये सब सियासी परिस्थितियां ही तय करती हैं। पंजाब की सियासत में आजकल कुछ ऐसा ही देखने को मिल रहा है, जहां कभी जो कैप्टन अमरिंदर सिंह को सलाम किया करते थे, आज वे नवजोत सिंह सिद्धू के साथ मिलकर 'ताली ठोक रहे' हैं। पंजाब कांग्रेस में कलह की खबरों के बीच अब बदले-बदले समीकरण नजर आ रहे हैं। 

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राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो जो कभी कैप्टन अमरिंदर सिंह के नाम की शपथ खाया करते थे, आज वे ही उनके खिलाफ खुलकर बगवात कर रहे हैं। जिन्होंने कभी कैप्टन के प्रति वफादारी साबित करने के क्रम में 2015 में प्रताप सिंह बाजवा को पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में गिराने के लिए हर संभव कोशिश की थी, आज वही 'माझा ब्रिगेड' की तिकड़ी (तृप्त राजिंदर बाजा, सुखजिंदर रंधावा और सुखबिंदर सरकारिया) नवजोत सिंह सिद्धू के लिए खुलकर कैप्टन के खिलाफ बैटिंग कर रही है। 

कांग्रेस नेता तृप्त राजिंदर बाजवा, सुखजिंदर रंधावा और सुखबिंदर सरकारिया अब नवजोत सिंह सिद्धू के लिए रास्ता आसान बनाने के लिए सीएम अमरिंदर सिंह को परेशान करने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। इन नेताओं ने एक बार फिर अपनी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए उस नेता (सिद्धू) का पक्ष लिया, जिनके बारे में उन्हें लग रहा है कि वह अपनी पार्टी को सत्ता में बनाए रख सकते हैं।

कैप्टन कैबिनेट में साढ़े चार साल तक महत्वपूर्ण विभागों का आनंद लेने के बाद इन तीनों नेताओं ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के साथ मतभेदों को हवा देना शुरू कर दिया। खासकर कोटकपुरा पुलिस फायरिंग मामले में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के प्रतिकूल फैसले के बाद।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नवजोत सिंह सिद्धू की चीफ के रूप में नियुक्ति से राज्य की पार्टी इकाई में संकट का समाधान नहीं हुआ है, बल्कि यह वर्चस्व की लंबी लड़ाई की शुरुआत हो सकती है। वहीं, अन्य लोगों का मानना है कि पीसीसी प्रमुख के रूप में सिद्धू का उत्थान शाही वंशज को नीचे गिराने की कोशिश में एक बड़ी साजिश का पहला चरण है।
 

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